हिन्दु-धर्म में अहिंसा – एक अवलोकन
वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन, गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदावाद – 380009
www.vasantbhatt@blogspot.com
E-mail : bhattvasant@yahoo.co.in
हिन्दु-धर्म का इतिहास 5000 वर्षों से भी अधिक पुराना है । अतः हिन्दुधर्म में अहिंसा के विचार को लेकर कोई चिन्तन प्रस्तुत करना एक साहस ही सिद्ध हो सकता है । फिर भी, कुछ मुख्य एवं विशेष सीमा चिह्नरूप सन्दर्भों को लेकर, ब्राह्मण-संस्कृति के विस्तृत फलक पर विकसित हुये अहिंसा के विचार को परिमित शब्दों में कहने का प्रयास किया जाता हैः—
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ब्राह्मण-संस्कृति में ऋग्वेद के मन्त्रों में वैसे तो प्राधान्येन विविध देवताओं की स्तुतियाँ आयी हुई है । लेकिन इन्द्र, अग्नि आदि देवों की स्तुतिओं के साथ साथ
“ पुमान् पुमांसम् परिपातु विश्वतः ” ( एक पुरुष दूसरे पुरुष का सभी तरह से रक्षण करे ), और “ वसुधैव कुटुम्बकम् ” के विचार भी वेदमन्त्रों में प्रस्तुत हुए है । एवमेव, ऐसे ही सर्वात्मभाव को बढावा देने के लिये, अर्थात् सब जीव एक है - इस विचार से “ यह मामकीन है और दूसरा व्यक्ति परकीय है” ऐसे भेदभाव को हटाने के लिये, वेदों में यह भी कहा गया है कि “ यत्र भवति विश्वम् एक-नीडम् । ” ( जहाँ सारा विश्व चीडियों का एक घोंसला बनके रहे ) । धार्मिक कट्टरता के कारण होनेवाली हिंसा पर लगाम डालने के लिये ऋग्वेद में “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” ( एक ही सत्य को बुद्धिमानों ने अनेक तरह से कहा है ) ऐसा भी स्पष्ट शब्दों में कहा गया है । इसका सूचितार्थ यही है कि ऋग्वेद में भले ही अहिंसा जैसे शब्द का सीधा प्रयोग नहीं दिखाई देता है, परन्तु किसी भी मनुष्य या पशु की हिंसा करने का तो नहीं कहा गया है - यह निश्चित है ।।
कालान्तर में जब यजुर्वेद की रचना हुई तब विविध प्रकार के यज्ञ-यागादि की स्पष्ट संकल्पनायें आविर्भूत हुई । जिसमें अनेक नित्य एवं नैमित्तिक यज्ञों का निरूपण हुआ और उसी परंपरा में अश्वमेध यागादि का विधान हुआ । जिससे पशु-बलि का कुरिवाज चल पडा । आदमी का कमजोर दिमाग पशुबलि से विरत तो हुआ नहीं, बल्कि नरमेध-याग की पराकाष्ठा तक पहुँचा । और वित्तैषणा, पुत्रैषणा एवं लोकैषणा से पीडित समाज ने यज्ञीय हिंसा हिंसा नहीं कहलाती, तथा यज्ञ के लिये मारे गये प्राणी को तो स्वर्ग ही मिलता है – ऐसा कपटी वाक्य भी प्रचार में रख दिया । ऋग्वेद एवं उपनिषदों के बीच में जो ब्राह्मण-ग्रन्थ लिखे गये, तथा बाद में जो पूर्वमीमांसा दर्शन विकसित हुआ उसमें ऐसी मान्यता ने स्थान लिया था । परन्तु ऋग्वेद की तरह उपनिषदों ने भी सर्वात्मभाव की ही बात पुकार के साथ कही थी और बहुविध उक्तिओं में उसे दोहराई थी । जीवात्मा और ब्रह्माण्ड की कोई भी हस्ती परस्पर से भिन्न नहीं है, सर्वत्र अभेद ही है, ऐसा कहनेवाले उपनिषदों का अद्वैतवाद तो शब्दान्तर से अहिंसा के विचार का ही सर्वथा दृढीकरण करनेवाला था – यह कहने की जरूरत नहीं है ।।
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फिर भी, कुछ कालावधि तक प्रवर्तित ब्राह्मण-संस्कृति की यज्ञक्रियाओं में जो पशु-हिंसा हो रही थी उसको रोकने के लिये, भगवान् बुद्ध ने करुणा का उपदेश दिया और भगवान् महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया । ब्राह्मण-संस्कृति में सुधार लाने का श्रेयः निःशङ्क रूप से श्रमण-संस्कृति को जाता है । और, चूँकि ब्राह्मण-संस्कृति में एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – का विचार पूर्वप्रस्थापित था ही, बुद्ध और महावीर की वाणी का स्वीकार करने में ब्राह्मण-संस्कृति को ज्यादा कठिनाई नहीं हुई ।
परन्तु महाभारत में भगवद्गीता के नाम से जो श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद निरूपित हुआ है उस में, राष्ट्रधर्म के उद्देश को लक्षित करके युद्ध की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से स्वीकारा भी गया है । अर्जुन ने जब घोर हिंसा की सम्भावना देखी तो उसने युद्ध नहीं करने का और संन्यास लेने का ही सोचना शूरु किया । परन्तु युगपुरुष श्रीकृष्ण ने कहा की इन आततायी ( आतंकवादीओं ) कौरवों को तुं नहीं मारेगा तो, आज जो हाल एक द्रौपदी का हुआ है वही हाल समाज की अन्य स्त्रीओं का भी होगा । अधर्म का फैलावा होने पर समाज और राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है । अतः श्रीकृष्ण की दृष्टि में धर्मयुद्ध तो अनिवार्य है ही । वह कहते हैः- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ, नैतत् त्वयि उपपद्यते । अर्थात् हे अर्जुन ! तुम नपुँसकता को धारण न करो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता है । इस तरह भगवद्गीता में राष्ट्रधर्म प्रेरित हिंसा को मान्यता दी गई है ।।
परन्तु उसी भगवद्गीता में, वैदिक यज्ञों की निन्दा भी की गई है और यज्ञ की विभावना ही बदल दी गई है – यह भी नितान्त सत्य है । अब निर्दोष पशु के बलि को किसी भी रूप में मान्यता नहीं थी । युगपुरुष श्रीकृष्ण की नयी सोच में स्वार्पण एवं कृतज्ञता बुद्धि से किया हुआ कर्म ही यज्ञ था । एवं लोकसङ्ग्रह की मंगलकारिणी बुद्धि से और अनासक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म यज्ञ था । सीता या द्रौपदी की तरह समाज की अन्य स्त्रियाँ भी संरक्षणीय है – यह सोचना एक तरह का लोकसङ्ग्रह ही था । ऐसे लोकसङ्ग्रह के उद्देश्य से किया हुआ कोई भी युद्ध हिंसक नहीं माना गया है । क्योंकि आततायीओं को नहीं मार कर जो हिंसा को टाली जाती है, उससे कहीं अधिक हिंसा उन लोगों को जीन्दा छोडने से होती है । अतः युगपुरुष श्रीकृष्ण की यह सोच साम्प्रत भारत में अतीव ध्यानार्ह एवं प्रस्तुत है ।।
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भगवद्गीता में न केवल यज्ञ की विभावना ही बदली गई है, परन्तु उसमें सम्भवामि युगे युगे – जैसे शब्दों से जो अवतारवाद का शंख फूंका गया है, उसने भी हिन्दुस्तान में धार्मिक सहिष्णुता को बलिष्ठ बनायी है । यज्ञीय पशु-हिंसा की निन्दा करनेवाले बुद्ध को भी ब्राह्मण-संस्कृति ने, केशव धृतबुद्धशरीर....जय जगदीश हरे – ( गीतगोविन्द के ) इन शब्दों से भगवान् विष्णु के दश अवतारों में स्थान दिया है । कवि जयदेव के इन शब्दों को पुराणकारों ने भी सम्मान के साथ दृढीभूत कर दिया । एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – तो वेदों में कहा ही गया था, इस लिये बुद्ध के करुणापूर्ण वचन ग्रहण करने में या महावीर के दयाप्रेरित जीव-अहिंसा के विचार को अपनाने में ब्राह्मण-संस्कृति को कोई बाधा ही नहीं थी ।
साथ में, अहिंसा के विचार पर तात्त्विक विचार करते हुये योगमहर्षि पतञ्जलि को अहिंसा में क्या बल है यह भी अनुभूत हो गया । उन्हों ने लिख दिया कि – अहिंसाप्रतिष्ठायाम् सर्व-प्राणिनाम् वैरत्यागः ( भवति ) ।। जो आदमी ने सम्पूर्णतया अहिंसा सिद्ध करली है उसकी ओर अन्य सभी प्राणी भी वैर का त्याग करके रहते है ।
इस तरह से, हिन्दुधर्म में वेदकाल से अन्य शब्दों में अभिव्यक्त हुआ अहिंसा का विचार, कुछ कालावधि में प्रकट शब्दों में बद्धमूल हो गया ।।
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धार्मिक ग्रन्थों के सन्दर्भों के अलावा संस्कृत-साहित्य में यदि दृष्टिपात् किया जाय तो भी हिन्दुधर्मियों में अहिंसा की भावना जिस रूप में प्रवहमान थी उसका अन्दाजा मिल जायेगा । सब से पहेले कविकुलगुरु कालिदास के द्वारा अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में मानव और प्रकृति का जो सम्बन्ध चित्रित किया गया है उसे ही देखना उपयुक्त रहेगा । कवि ने कहा है कि नायिका शकुन्तला को शरीर-सुशोभन करना पसंद था, परन्तु आश्रम के हरेक पौधे पर इनके मन में इतना स्नेह था कि वह एक पर्ण-पुष्प भी तोडती नहीं थी । वह अपनी सहेलियों से कहती है कि – अस्ति मम एतेषु सोदरस्नेहः । अर्थात् शकुन्तला को सभी वनस्पति के उपर सहोदर जैसा स्नेह था । और वन-उपवन में विचरण करनेवाले मृगों पर भी अपार दयाभाव था । जिसके कारण वह घास खाते समय मृगों के मुँह में लगे कण्टक के घाव को मिटाने के लिये उनके मुँह पर इङ्गुदीफल का तैल लगा देती थी । यह वह प्रकृति के सब सदस्य है जिसने शकुन्तला को जन्म से ले कर सुरक्षित रखी थी । माता मेनका ने तो शकुन्तला को जन्म दे कर ही जंगल में अनाथ छोड दी थी, परन्तु शकुन्तों ( पक्षिओं ) ने उसे पहेले दिन पाला था, इसी लिये वह शकुन्तला कहलाई थी । यहाँ महाकवि ने मानव और प्रकृति का अभिन्न सम्बन्ध दिखाया है । जो सारे विश्व भर के साहित्य में बेजोड है । अन्यत्र ( युरोपिय देशों में ) तो पृथिवी के केन्द्र में मानव है, और पूरी प्रकृति मानव के उपभोग के लिये है – ऐसी मान्यता प्रवर्तित की गई है । लेकिन भारतीय नायिका – शकुन्तला अपने सुशोभन के लिये भी एक पर्ण भी तोडना पसंद नहीं करती है, और वन के मृगों तक की देखभाल रखती है, क्योंकि वह प्रकृति को अपना अङ्ग ही समझती है । ऐसी माता शकुन्तला का पुत्र आगे चल कर एक बडा चक्रवर्ती राजा बनता है । इस पुत्र का नाम हैः- भरत । अर्थात् सब का भरण-पोषण करनेवाला । और इस भरत के नाम से यह देश भारत कहलाया । ( जो सब का भरण करनेवाला है, जो किसीका विनाश करना नहीं चाहता है । )
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इस प्रसंग में संस्कृत साहित्य का एक अप्रकट और अज्ञात चिन्तन भी बताना अत्यन्त आवश्यक है । इस अमर साहित्य में, आदिकवि वाल्मीकि के समय से ही एक शब्द बार बार प्रयुक्त होता रहा हैः- अनुक्रोश । जिसका अर्थ होता है – परदुःखदुःखिता । = दूसरे के दुःख को देख कर स्वयं दुःखी हो जाना । इस शब्द से व्यक्त होनेवाला जो अर्थ है वह करुणा और दया के बीच का है । करुणा और दया बडे महनीय मानव-धर्म है, परन्तु इस धर्म की ओर ले जानेवाला जो मानवीय तत्त्व है वह है – अनुक्रोशत्व । संस्कृत-साहित्य में बार बार उल्लिखित हुआ यह अनुक्रोशत्व ही अहिंसा का बीजभूत तत्त्व है । रावण ने सीताजी को, अपहरण करके ले जाने के बाद, उसको वशीभूत करने के अनेक बार प्रयास किया । परन्तु वह कभी सफल नहीं हुआ था । यहाँ प्रश्न होता है कि – ऐसी स्थिति में रावण ने सीताजी को क्यूं नहीं मार डाला ? तब वाल्मीकि कहते है कि रावण हंमेशा यही सोचता था कि शस्त्राघात करने पर उसको कितनी वेदना होगी ? – यह थी अनुक्रोश-बुद्धि, जिसके कारण रावण ने सीता को अन्त तक जीवित रखी थी । दूसरी ओर कुन्दमाला नामक नाटक में कवि कहते है कि लव और कुश जब आश्रम में कोई शरारत करते थे तो सीता उन दोनों को “ निरनुक्रोशपिता के पुत्र ” कहे कर उन को पुकारती थी । यहाँ लव-कुश के लिये सीताजी ने जो संज्ञा का प्रयोग किया है वह बडी मार्मिक है । इस में सीताजी की एक शिकायत छीपी हुई हैः— एक सगर्भा स्त्री को घर से नीकाल देते समय किसी भी पुरुष को सोचना चाहिये कि उसे क्या पीडा भुगतनी होगी । कोई भी सामान्य पुरुष जिस पीडा को समझ सकता है वह पुरुषोत्तम राम नहीं समझ सके । जब राम में इस प्रकार का अनुक्रोशत्व ही नहीं है ऐसा सीता को अनुभूत होता है तब वह राम के लिये निरनुक्रोश शब्द का प्रयोग कर रही है । ( यद्यपि यहाँ एक स्पष्टता करनी अत्यंत आवश्यक भी है कि राम यदि पुरुषोत्तम थे उन्होंने ऐसा क्यूं किया । राम ने सीता के प्रति निरतिशय स्नेहभाव होते हुये भी लोकाराधन के व्रत को अपना सर्वोच्च धर्म माना था, उस लिये वह वज्र से कठोर हो कर सीता के प्रति निरनुक्रोश बन सके थे । यह कोई अन्य पामर मनुष्य के वश की बात नहीं थी ।। - यह बात भी कुन्दमाला नाटक लिखनेवाले दिङ्नाग कवि को अनजान नहीं थी । )
संस्कृतकविओं का समुदाय इस अनुक्रोशत्व को एक मानवीय तत्त्व के रूप में प्रस्थापित करते रहे है । महाकवि कालिदास का यक्ष भी मेघदूत के अन्त में बादल से कहता है कि हे मेघ, तुम मुझ पर अनुक्रोश-बुद्धि से देखो और मुझे साहाय्य करो । मेरा सन्देश मेरी प्रियतमा के पास ले जाओ । यदि तुम भी अपनी प्रिया से वियुक्त हो गया होतो तुम कितने दुःखी रहोंगे – यह सोच कर तुम मेरी मदद करो । इसी को अनुक्रोशत्व कहते है । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गीरते हुए देख कर ही तुरंत उसको उठाने के लिये दौड जाता है – यह अनुक्रोश है । जो एक मानव-सहज संवेदना है, और यही सच्चा मानवीय तत्त्व है ।
कालिदास की तरह, नाट्यकार भास ने भी इस अनुक्रोशत्व नामक गुण की अनेक स्थानों पर प्रशंसा की है । अविमारक नामक नाटक में कुरंगी नाम की राजकुमारी पर मदोन्मत्त हस्ती का आक्रमण होने जा रहा था और सभी नगरजन तितर-भीतर हो गये थे, तब केवल एक अज्ञात युवक ने तुरंत वहाँ आकर हस्ती को मार भगाया, और राजकुमारी को जीवनदान दिया । यहाँ कवि भास ने कुरंगी की माता से कहलाया है कि यह युवक भले ही अज्ञात-कुल हो, परन्तु उस युवक ने निश्चित ही अपने आपको ( ईश्वर के अपार ) कारुण्य के ऋण से मुक्त करवा लिया है । संस्कृतसाहित्य के कविलोग यह मानते है कि ईश्वर की अपार करुणा के बिना हमें न सूरज की रोशनी मिल सकती है, आकाश से न जल की वृष्टि होती, न श्वास लेने को प्राणवायु मिलती । हम सब पर ईश्वर की करुणा का अनहद ऋण है और इस ऋण से मुक्त होने के लिये हमें सभी प्राणिओं के प्रति अनुक्रोश रखना चाहिये ।।
संस्कृत कविओं की सोच है कि ईश्वर द्वारा हम पर प्रदर्शित की गई करुणा को ध्यान में लेते हुये हमें भी अन्य जीवों के प्रति अनुक्रोश-बुद्धि रखते हुये जीवन जीना चाहिये । क्योंकि, यदि हमारा जीवन ही किसी की करुणा पर निर्भर है । तो अनुक्रोशत्व का पालन करना हमारा धर्म बन जाता है । इस अनुक्रोश में से ही दया का उदय होता है । भूत मात्र पर जब दया पैदा होती है तो अहिंसा अपने आप हमारे आचार का अभिन्न अङ्ग बन जायेगी ।।
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Sunday, 20 September 2009
Tuesday, 16 June 2009
कोश-विज्ञान की भारत में कब भोर भई ?
भारत में कोशविज्ञान की कब भोर भई ?वसन्तकुमार म. भट्ट
अध्यक्ष, संस्कृतविभाग
गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद-9
bhattvasant@yahoo.co.in
भूमिका - यह बात सर्वविदित एवं सर्वस्वीकृत है कि भारत में कोशविज्ञान का आरम्भ ‘निघण्टु’ नामक वैदिक शब्दकोश से हुआ है । यास्क ने ई.पूर्व 600 में, इस शब्दकोश के शब्दों का निर्वचन देने के लिए जो भाष्य लिखा है, उसका नाम “निरूक्तम्” है । इस शब्दकोश का स्वरूप देखा जाय तो उसमें 1.पर्यायवाची शब्दों का बना प्रथम काण्ड है, 2. अनेकार्थक शब्दों का दूसरा काण्ड है और 3.तीसरे काण्ड में देवता-सम्बन्धी शब्दों का संग्रह है । इस ‘निघण्टु’ शब्दकोश को आदर्श बनाके और इससे ही प्रेरणा प्राप्त करके कालान्तर में ‘अमरकोश’ की रचना हुई ।
परन्तु, इस प्रचलित मत में थोडी नूकताचीनी करनी आवश्यक दिखाई दे रही है । यह जो ‘निघण्टु’ नामक बैदिकशब्दकोश है, उसमें उपर्युक्त त्रिविध काण्ड की जो वर्गीकृत व्यवस्था है वह तो कोशविज्ञान की प्रायः पूर्ण विकसित स्थिति की परिचायक है । लेकिन भारत में कोशविज्ञान की भोर कब भई होगी ? यह प्रश्न तो पुनरीक्षणीय है ही ।
(2)
पाणिनि के “अष्टाध्यायी” व्याकरण में यद्यपि ‘वाक्य’ की निष्पत्ति कैसे होती है- इसका निरूपण किया गया है । जिसमें वाक्य की दो प्रमुख ईकाइ मानी गई है -1.सुबन्तपद (नामपद) और 2.तिङन्तपद (क्रियापद) । परन्तु पाणिनि ने अपनें सूत्रों को स्वल्पाक्षर बनाने के लिए जो धातुपाठ, गणपाठ बनाये है, वह एक दृष्टि से विभिन्न प्रकार के शब्द-यूथ बनाने का ही कार्य था । इन शब्द जूटों में, यद्यपि गणपाठ में ‘अर्थप्रदर्शन’ की बात नहीं थी । फिर भी तरह तरह के शब्दयूथ बनाना ही कोशविज्ञान की शूरूआत कही जा सकती है । गणपाठ के अलावा पाणिनि-निर्दिष्ट ‘निपातनसूत्रों’ में उल्लिखित शब्दों भी एक तरह का शब्दजूट बनाना ही था ।।
(3)
पाणिनि के पूर्वकाल में भी भाषा-विषयक विचारणा करनेवाले अनेक वैयाकरणादि हुये थे । जिनमें से ऋग्वेद के पदपाठकार शाकल्य का नाम समयावधि की दृष्टि से अग्रगण्य है । शाकल्य ने वेदमन्त्रों की संहिता को तोडकर पदपाठ बनाया । इस पदपाठ का एक केन्द्रवर्ती नियम यह था कि सबसे छोटा जो भी अर्थवाहक शब्दांश हो उसको विश्लेषित करके दिखाया जाय । प्राचीन भारत में, वाक्य में जो भी सबसे छोटा अर्थवाहक अंश होता है, वह “ पद ” कहलाता है ( अर्थः पदम् । ) – ऐसा माननेवाला भी एक पक्ष था । जो ऋग्वेद का पदपाठ बनाने की आधारशिला थी । कोशविज्ञान में सब से पहले जो प्रविष्टि (Word- entry) बनाने का कार्य होता है, उस में भी सबसे छोटी अर्थवाहक ध्वनिश्रेणी को ही स्थान दिया जाता है, उसका आरम्भ ऋग्वेद के पदपाठ में देखा जा सकता है ।।
(4)
दूसरी ओर वैयाकरणों में अतीव ध्यानास्पद एवं चर्चास्पद नाम था शाकटायन का । यास्क ने कहा है कि- “नामानि आख्यातजानि इति शाकटायनः”। (निरुक्तम् अ.1) इन का मत था कि भाषा में जो भी (संज्ञावाचक) नाम का प्रयोग होता है, वे सभी कोई एक (या एकाधिक) क्रियावाचक धातु से निष्पन्न हुए है। यथा- अश्नोति अध्वानम् इति अश्वः। “जो मार्ग को (तीव्र गति से) नाप लेता है, वह अश्व” कहलाता है । अतः शाकटायन भाषा में प्रयुक्त होनेवाले नामों के प्रसिद्ध अर्थात् परम्परागत अर्थों की संगति किसी न किसी धातु से (धातु के अर्थ एवं ध्वनिसादृश्य से) बिठाने का कार्य करनेवाले निर्वचनकार थे । इस शाकटायन को अपने गुरुपद पर स्थापित करके यास्क ने ‘निघण्टु’ में संगृहीत शब्दों पर व्याख्या लिखी है । शाकटायन एवं यास्क की यह प्रवृत्ति कोशविज्ञान से सुसम्बद्ध ऐसी अर्थविज्ञान की विचारधारा को पुष्पितपल्लवित करने की प्रवृत्ति थी । दूसरे शब्दों में कहे तो यह प्रवृत्ति कोशविज्ञान के साथ आनुषंगिक रूप से सम्बद्ध थी ।
(5)
परन्तु स्पष्टरूप से कोशविज्ञान का ही ईषत्-ईषत् चमत्कार जहाँ दिखाई दे रहा है- वह है “उणादि (पञ्चपादी)”सूत्रपाठ । पाणिनि ने अष्टाध्यायी में उणादयो बहुलम् । 3-3-1 सूत्र से उणादिसूत्रपाठ की ओर केवल अंगुलिनिर्देश ही किया है । उन्होंने स्वयं कोई उणादिसूत्र बनाये थे या नहीं –यह आज अज्ञेय है । परन्तु वे जब पूर्वोक्त 3-3-1 सूत्र को दे रहे है तो यह बात निश्चित है कि उणादिसूत्रों का अस्तित्व पाणिनि से भी पूर्व में था । यहाँ पर, अर्थात् उणादि(पञ्चपादी) सूत्रपाठ में प्राधान्येन ऐसे सूत्र प्रस्तुत हुए है कि अमुक अमुक शब्दों का अन्तिम प्रत्ययांश एक समान है । तद्यथा -
(1) कृ-वा-पा-जि-मि-स्वदि-साध्यशू-भ्य उण् । (1-1) इस सूत्र से ‘कृ’, ‘वा’ इत्यादि धातुओं से ‘उ’(ण्) प्रत्यय जूडने से कारु, वायु, पायु, जायु, मायु, स्वादु, साधु, आशु जैसे “उकारान्त शब्द” सिद्ध हुए है ।
(2) सि-तनि-गमि-मसि-सच्यविधाञ्क्रुशिभ्यस्तुन् । (1-69) सूत्र से कहा गया है कि - सि, तनि इत्यादि धातुओं से ‘तु’(न्) प्रत्यय लगने से सेतु-तन्तु-गन्तु-मस्तु-सक्तु-ओतु-धातु इत्यादि ‘तु’ प्रत्ययान्त शब्द बनते / बने है ।।
(3) कृ-गृ-शृ-वृञ्चतिभ्यः ष्वरच् । (2-279) सूत्र से कृ-गृ इत्यादि धातुओं से ष्वरच् प्रत्यय लगता है । जिससे- कर्बरः, गर्वरः, शर्वरी, बर्बरः शब्द बने है ।।
(4) छित्वर-छत्वर-धीवर-पीवर-मीवर-चीवर-तीवर-नीवर-गह्वर-कट्वर-संयद्वराः । (3-281) सूत्र से छित्वर, धीवर इत्यादि शब्द भी ‘ष्वरच्’(वर) प्रत्यय लगने से सिद्ध होते है (हुए है) ।।
(5) खष्प-शिल्प-शष्प-बाष्प-रूप-पर्प-तल्पाः । (3-308) सूत्र से ‘प’ प्रत्यय का विधान किया गया है, जिसके फलस्वरूप शिल्प-बाष्प इत्यादि जैसे ‘प’ प्रत्ययान्त शब्दों की संघटना हुई है।
(6) कृ-शृ-पृ-कटि-पटि-शौटिभ्य ईरन् । (4-470) सूत्र से ‘ईरन्’ प्रत्यय का विधान होता है और करीर, शरीर, परीर, कटीर, पटीर, शौटीर जैसे शब्द तैयार होते है । ये सभी शब्द ‘ईर’ प्रत्ययान्त है- ऐसा दिखाई दे रहा है।
(7) इसी तरह से- प्रथेरमच् । (5-746) सूत्र से ‘प्रथ्’ धातु से ‘अमच्’ प्रत्यय लगता है, और ‘प्रथम’ शब्द बनता है। चरेश्च । (5-747) सूत्र से भी ‘चर्’ धातु से ‘अमच्’ प्रत्य लगता है, और ‘चरम’ शब्द सिद्ध होता है । तथा मङ्गेरलच् । (5-747) सूत्र से ‘मङ्ग’ धातु से ‘अलच्’ प्रत्यय जूड कर ‘मङ्गल’ शब्द की सिद्धि हुई है – ऐसा दिखाई दे रहा है।
इन उदाहरण रूप उणादिसूत्रों को देख कर एक बात स्पष्ट होती है कि अज्ञात उणादि-सूत्रकार ने यहाँ पर न धात्वर्थ की और ध्यान दिया है, और न तो प्रत्ययार्थ क्या है – यह बताया है । उसका मतलब तो यही होगा की उनकी दृष्टि शब्दों की प्रत्ययान्त-स्थिति कहाँ कहाँ पर एक समान है यह देख कर ऐसे समानाकृतिवाले शब्दों का एकत्रीकरण किया जाय ।। यही तो है ‘इदं प्रथमतया’ कोशकार्य का आरम्भ ।
पाणिनि ने भाषा की बृहत्तम ईकाइ को (वाक्य को) लेकर उसकी संयोजना बताई थी । और उसके पूर्वकाल में पदपाठकार शाकल्य थे, जिन्हों ने वेदमन्त्रों को लेकर सब से छोटे सार्थक शब्दांश का विश्लेषण प्रस्तुत किया । इन दोनों के बीच (शाकल्य एवं पाणिनि के बीच) उणादिसूत्रों के अज्ञात रचयिता ने, शब्द के अन्तिम प्रत्ययांश को अपनी चयन प्रक्रिया का नियामक तत्त्व बनाके, विविध शब्दों के यूथ बनाने का सब से पहेले आरम्भ किया था ।
कोश-प्रणयन में अर्थानुसारी शब्दचयन या पृथिवीलोक-स्वर्गलोकादि सम्बन्धी शब्दों का चयन करना- यह सब बहुत परवर्तीकाल की विकसित स्थिति है । परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो भारत में ‘निघण्टु’ जैसे “एकार्थक अनेक शब्दों ” एवं “अनेकार्थक एक-एक शब्दों” का संग्रह(कोश) बनाने की प्रवृत्ति से भी पूर्वकाल में उणादि सूत्रकारने ही शब्दों के बाह्यशिल्प को अर्थात् शब्दों की अन्तिम ध्वनि सामान्य रूप से / समान रूप से कहाँ कहाँ दिखाई दे रही है ? – इसकी गवेषणा की थी । यही होगा कोशविज्ञान का उषःकाल ।।
अर्थ से निरपेक्ष रहते हुए, केवल शब्दों के अन्तिम भाग को ही देख कर शब्दों का यूथ बनाने का कार्य उणादिसूत्रों में शूरू हुआ था- यह देख कर कहना पडेगा कि आज के कोशविज्ञान के बीजवपन का कार्य सब से पहले उणादि सूत्रकार ने ही किया था ।।
कोशकार्य के प्राथमिक उद्देश्य 1. अर्थनिर्धारण करना, 2.शब्द की वर्तनी स्थिर करना तथा 3. शब्दों के लिङ्ग का नियमन करना- ये सभी बातें बाद में आती है, लेकिन शब्दों के कोई एक स्वरूप (बाह्यशिल्प) को नियामक तत्त्व के रूप में लेकर, समानरूप वाले शब्दों का एकत्रीकरण करना यही कोशकार का प्रथमतम कर्तव्य होता है । अतः हम कह सकते है कि इन उणादिसूत्रों की रचना के साथ ही कोशविज्ञान की भोर भई थी ।।
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अध्यक्ष, संस्कृतविभाग
गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद-9
bhattvasant@yahoo.co.in
भूमिका - यह बात सर्वविदित एवं सर्वस्वीकृत है कि भारत में कोशविज्ञान का आरम्भ ‘निघण्टु’ नामक वैदिक शब्दकोश से हुआ है । यास्क ने ई.पूर्व 600 में, इस शब्दकोश के शब्दों का निर्वचन देने के लिए जो भाष्य लिखा है, उसका नाम “निरूक्तम्” है । इस शब्दकोश का स्वरूप देखा जाय तो उसमें 1.पर्यायवाची शब्दों का बना प्रथम काण्ड है, 2. अनेकार्थक शब्दों का दूसरा काण्ड है और 3.तीसरे काण्ड में देवता-सम्बन्धी शब्दों का संग्रह है । इस ‘निघण्टु’ शब्दकोश को आदर्श बनाके और इससे ही प्रेरणा प्राप्त करके कालान्तर में ‘अमरकोश’ की रचना हुई ।
परन्तु, इस प्रचलित मत में थोडी नूकताचीनी करनी आवश्यक दिखाई दे रही है । यह जो ‘निघण्टु’ नामक बैदिकशब्दकोश है, उसमें उपर्युक्त त्रिविध काण्ड की जो वर्गीकृत व्यवस्था है वह तो कोशविज्ञान की प्रायः पूर्ण विकसित स्थिति की परिचायक है । लेकिन भारत में कोशविज्ञान की भोर कब भई होगी ? यह प्रश्न तो पुनरीक्षणीय है ही ।
(2)
पाणिनि के “अष्टाध्यायी” व्याकरण में यद्यपि ‘वाक्य’ की निष्पत्ति कैसे होती है- इसका निरूपण किया गया है । जिसमें वाक्य की दो प्रमुख ईकाइ मानी गई है -1.सुबन्तपद (नामपद) और 2.तिङन्तपद (क्रियापद) । परन्तु पाणिनि ने अपनें सूत्रों को स्वल्पाक्षर बनाने के लिए जो धातुपाठ, गणपाठ बनाये है, वह एक दृष्टि से विभिन्न प्रकार के शब्द-यूथ बनाने का ही कार्य था । इन शब्द जूटों में, यद्यपि गणपाठ में ‘अर्थप्रदर्शन’ की बात नहीं थी । फिर भी तरह तरह के शब्दयूथ बनाना ही कोशविज्ञान की शूरूआत कही जा सकती है । गणपाठ के अलावा पाणिनि-निर्दिष्ट ‘निपातनसूत्रों’ में उल्लिखित शब्दों भी एक तरह का शब्दजूट बनाना ही था ।।
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पाणिनि के पूर्वकाल में भी भाषा-विषयक विचारणा करनेवाले अनेक वैयाकरणादि हुये थे । जिनमें से ऋग्वेद के पदपाठकार शाकल्य का नाम समयावधि की दृष्टि से अग्रगण्य है । शाकल्य ने वेदमन्त्रों की संहिता को तोडकर पदपाठ बनाया । इस पदपाठ का एक केन्द्रवर्ती नियम यह था कि सबसे छोटा जो भी अर्थवाहक शब्दांश हो उसको विश्लेषित करके दिखाया जाय । प्राचीन भारत में, वाक्य में जो भी सबसे छोटा अर्थवाहक अंश होता है, वह “ पद ” कहलाता है ( अर्थः पदम् । ) – ऐसा माननेवाला भी एक पक्ष था । जो ऋग्वेद का पदपाठ बनाने की आधारशिला थी । कोशविज्ञान में सब से पहले जो प्रविष्टि (Word- entry) बनाने का कार्य होता है, उस में भी सबसे छोटी अर्थवाहक ध्वनिश्रेणी को ही स्थान दिया जाता है, उसका आरम्भ ऋग्वेद के पदपाठ में देखा जा सकता है ।।
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दूसरी ओर वैयाकरणों में अतीव ध्यानास्पद एवं चर्चास्पद नाम था शाकटायन का । यास्क ने कहा है कि- “नामानि आख्यातजानि इति शाकटायनः”। (निरुक्तम् अ.1) इन का मत था कि भाषा में जो भी (संज्ञावाचक) नाम का प्रयोग होता है, वे सभी कोई एक (या एकाधिक) क्रियावाचक धातु से निष्पन्न हुए है। यथा- अश्नोति अध्वानम् इति अश्वः। “जो मार्ग को (तीव्र गति से) नाप लेता है, वह अश्व” कहलाता है । अतः शाकटायन भाषा में प्रयुक्त होनेवाले नामों के प्रसिद्ध अर्थात् परम्परागत अर्थों की संगति किसी न किसी धातु से (धातु के अर्थ एवं ध्वनिसादृश्य से) बिठाने का कार्य करनेवाले निर्वचनकार थे । इस शाकटायन को अपने गुरुपद पर स्थापित करके यास्क ने ‘निघण्टु’ में संगृहीत शब्दों पर व्याख्या लिखी है । शाकटायन एवं यास्क की यह प्रवृत्ति कोशविज्ञान से सुसम्बद्ध ऐसी अर्थविज्ञान की विचारधारा को पुष्पितपल्लवित करने की प्रवृत्ति थी । दूसरे शब्दों में कहे तो यह प्रवृत्ति कोशविज्ञान के साथ आनुषंगिक रूप से सम्बद्ध थी ।
(5)
परन्तु स्पष्टरूप से कोशविज्ञान का ही ईषत्-ईषत् चमत्कार जहाँ दिखाई दे रहा है- वह है “उणादि (पञ्चपादी)”सूत्रपाठ । पाणिनि ने अष्टाध्यायी में उणादयो बहुलम् । 3-3-1 सूत्र से उणादिसूत्रपाठ की ओर केवल अंगुलिनिर्देश ही किया है । उन्होंने स्वयं कोई उणादिसूत्र बनाये थे या नहीं –यह आज अज्ञेय है । परन्तु वे जब पूर्वोक्त 3-3-1 सूत्र को दे रहे है तो यह बात निश्चित है कि उणादिसूत्रों का अस्तित्व पाणिनि से भी पूर्व में था । यहाँ पर, अर्थात् उणादि(पञ्चपादी) सूत्रपाठ में प्राधान्येन ऐसे सूत्र प्रस्तुत हुए है कि अमुक अमुक शब्दों का अन्तिम प्रत्ययांश एक समान है । तद्यथा -
(1) कृ-वा-पा-जि-मि-स्वदि-साध्यशू-भ्य उण् । (1-1) इस सूत्र से ‘कृ’, ‘वा’ इत्यादि धातुओं से ‘उ’(ण्) प्रत्यय जूडने से कारु, वायु, पायु, जायु, मायु, स्वादु, साधु, आशु जैसे “उकारान्त शब्द” सिद्ध हुए है ।
(2) सि-तनि-गमि-मसि-सच्यविधाञ्क्रुशिभ्यस्तुन् । (1-69) सूत्र से कहा गया है कि - सि, तनि इत्यादि धातुओं से ‘तु’(न्) प्रत्यय लगने से सेतु-तन्तु-गन्तु-मस्तु-सक्तु-ओतु-धातु इत्यादि ‘तु’ प्रत्ययान्त शब्द बनते / बने है ।।
(3) कृ-गृ-शृ-वृञ्चतिभ्यः ष्वरच् । (2-279) सूत्र से कृ-गृ इत्यादि धातुओं से ष्वरच् प्रत्यय लगता है । जिससे- कर्बरः, गर्वरः, शर्वरी, बर्बरः शब्द बने है ।।
(4) छित्वर-छत्वर-धीवर-पीवर-मीवर-चीवर-तीवर-नीवर-गह्वर-कट्वर-संयद्वराः । (3-281) सूत्र से छित्वर, धीवर इत्यादि शब्द भी ‘ष्वरच्’(वर) प्रत्यय लगने से सिद्ध होते है (हुए है) ।।
(5) खष्प-शिल्प-शष्प-बाष्प-रूप-पर्प-तल्पाः । (3-308) सूत्र से ‘प’ प्रत्यय का विधान किया गया है, जिसके फलस्वरूप शिल्प-बाष्प इत्यादि जैसे ‘प’ प्रत्ययान्त शब्दों की संघटना हुई है।
(6) कृ-शृ-पृ-कटि-पटि-शौटिभ्य ईरन् । (4-470) सूत्र से ‘ईरन्’ प्रत्यय का विधान होता है और करीर, शरीर, परीर, कटीर, पटीर, शौटीर जैसे शब्द तैयार होते है । ये सभी शब्द ‘ईर’ प्रत्ययान्त है- ऐसा दिखाई दे रहा है।
(7) इसी तरह से- प्रथेरमच् । (5-746) सूत्र से ‘प्रथ्’ धातु से ‘अमच्’ प्रत्यय लगता है, और ‘प्रथम’ शब्द बनता है। चरेश्च । (5-747) सूत्र से भी ‘चर्’ धातु से ‘अमच्’ प्रत्य लगता है, और ‘चरम’ शब्द सिद्ध होता है । तथा मङ्गेरलच् । (5-747) सूत्र से ‘मङ्ग’ धातु से ‘अलच्’ प्रत्यय जूड कर ‘मङ्गल’ शब्द की सिद्धि हुई है – ऐसा दिखाई दे रहा है।
इन उदाहरण रूप उणादिसूत्रों को देख कर एक बात स्पष्ट होती है कि अज्ञात उणादि-सूत्रकार ने यहाँ पर न धात्वर्थ की और ध्यान दिया है, और न तो प्रत्ययार्थ क्या है – यह बताया है । उसका मतलब तो यही होगा की उनकी दृष्टि शब्दों की प्रत्ययान्त-स्थिति कहाँ कहाँ पर एक समान है यह देख कर ऐसे समानाकृतिवाले शब्दों का एकत्रीकरण किया जाय ।। यही तो है ‘इदं प्रथमतया’ कोशकार्य का आरम्भ ।
पाणिनि ने भाषा की बृहत्तम ईकाइ को (वाक्य को) लेकर उसकी संयोजना बताई थी । और उसके पूर्वकाल में पदपाठकार शाकल्य थे, जिन्हों ने वेदमन्त्रों को लेकर सब से छोटे सार्थक शब्दांश का विश्लेषण प्रस्तुत किया । इन दोनों के बीच (शाकल्य एवं पाणिनि के बीच) उणादिसूत्रों के अज्ञात रचयिता ने, शब्द के अन्तिम प्रत्ययांश को अपनी चयन प्रक्रिया का नियामक तत्त्व बनाके, विविध शब्दों के यूथ बनाने का सब से पहेले आरम्भ किया था ।
कोश-प्रणयन में अर्थानुसारी शब्दचयन या पृथिवीलोक-स्वर्गलोकादि सम्बन्धी शब्दों का चयन करना- यह सब बहुत परवर्तीकाल की विकसित स्थिति है । परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो भारत में ‘निघण्टु’ जैसे “एकार्थक अनेक शब्दों ” एवं “अनेकार्थक एक-एक शब्दों” का संग्रह(कोश) बनाने की प्रवृत्ति से भी पूर्वकाल में उणादि सूत्रकारने ही शब्दों के बाह्यशिल्प को अर्थात् शब्दों की अन्तिम ध्वनि सामान्य रूप से / समान रूप से कहाँ कहाँ दिखाई दे रही है ? – इसकी गवेषणा की थी । यही होगा कोशविज्ञान का उषःकाल ।।
अर्थ से निरपेक्ष रहते हुए, केवल शब्दों के अन्तिम भाग को ही देख कर शब्दों का यूथ बनाने का कार्य उणादिसूत्रों में शूरू हुआ था- यह देख कर कहना पडेगा कि आज के कोशविज्ञान के बीजवपन का कार्य सब से पहले उणादि सूत्रकार ने ही किया था ।।
कोशकार्य के प्राथमिक उद्देश्य 1. अर्थनिर्धारण करना, 2.शब्द की वर्तनी स्थिर करना तथा 3. शब्दों के लिङ्ग का नियमन करना- ये सभी बातें बाद में आती है, लेकिन शब्दों के कोई एक स्वरूप (बाह्यशिल्प) को नियामक तत्त्व के रूप में लेकर, समानरूप वाले शब्दों का एकत्रीकरण करना यही कोशकार का प्रथमतम कर्तव्य होता है । अतः हम कह सकते है कि इन उणादिसूत्रों की रचना के साथ ही कोशविज्ञान की भोर भई थी ।।
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Saturday, 9 May 2009
उत्तररामचरित में शम्बूक-वध की मिथक का अपूर्व अर्थघटन
‘ उत्तररामचरित ’ में शम्बूक–वध की मिथक का पुनर्निर्माण
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वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन
गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद – 9
bhattvasant@yahoo.co.in
( भवभूति समारोह, फरवरी 2008, ग्वालियर में प्रस्तुत किया गया शोध-लेख )
1.0 प्राचीनतम धार्मिक मान्यताओं को व्यक्त करनेवाली अतिमानवीय कथाओं को ‘पुराकथा या पुराकल्पन’(अर्थात् Myth) ‘मिथक’ कहते है । कर्मफल के सिद्धान्त को विशद करने के लिए भी कदाचित् ‘मिथक’ का निर्माण किया जाता है । ऐसे मिथक प्रथम दृष्टि में तो नितान्त अवैज्ञानिक (या अर्धवैज्ञानिक) जैसे ही प्रतीत होते हैं । परन्तु ऐसे मिथकों के पीछे कोई संस्कृतिविशेष के लोगों की एक तिर्यक् दार्शनिक दृष्टि भी कार्यरत होती है । क्रान्तद्रष्टा कवि जब कोई काव्य का प्रणयन करते है तब वे प्रायः ऐतिहासिक ख्यात-इतिवृत्त का ही आश्रयण करते है, या तो कदाचित् अपूर्व-कल्पना मण्डित कथावस्तु लेकर सामने आते हैं । परन्तु जब ऐतिहासिक कथावस्तु का आश्रयण करके उसमें मूलतः उपनिबद्ध कोई मिथकीय तत्त्व का, अपनी निजी कविदृष्टि से, कोई अपूर्व अर्थघटन करके दिखलाते हैं तब वे मर्त्य कवि-व्यक्तित्व से उपर उठकर अमर महाकवि बन जाते है । ख्यात-इतिवृत्त का आश्रयण करनेवाले कवि से हम जो “कवि-न्याय” की उम्मीद रखते है उसमें भी मिथकीय अर्थघटन का समावेश किया जा सकता है ।
2.0 भवभूति की कविदृष्टि में राम के उत्तरजीवन में एक नहीं, दो घटनायें प्रमुख है -1. लोकापवाद से राम के द्वारा सीता का त्याग, एवं 2. अकालमृत्यु को प्राप्त हुए किसी ब्राह्मण के बालकपुत्र को पुनरुज्जीवित करने के लिए रामने किया हुआ शूद्र तापस – ‘शम्बूक’– का वध । इन दोनों घटनाओं को लेकर भवभूतिने ‘उत्तररामचरित’ की रचना की है । यहाँ पर (सीता-त्याग का) प्रथम घटनाचक्र तो पूरा ऐतिहासिक है, परन्तु जो दूसरी ( शूद्रतापस के वध द्वारा मृतपुत्र को पुनरुज्जीवित करने की ) घटना है, वह एक अवैज्ञानिक मिथक ही है । क्योंकि किसी शूद्र के तप करने से कोई ब्राह्मणपुत्र का अकाल मृत्यु हो जाय, या एक शूद्र-तापस का वध करने से वह बालक पुनरुज्जीवित हो जाय – यह दोनों बातें(मान्यतायें) आज के विज्ञानप्रधान युग में ग्राह्य नहीं हो सकती है । परन्तु महाकवि भवभूति ने सीतात्याग की ऐतिहासिक घटना को प्रथम अङ्क में रखी है, और शम्बूकबध की मिथकीय घटना दूसरे अङ्क में रखी है । तत्पश्चाद् अनुगामी (3 एवं 4-6) अङ्कों में इन दोनों घटनाओं के परिणाम क्रमशः दिखलाये हैं । जैसे कि– सीतात्याग की (प्रथमाङ्क की) घटना का परिणाम तृतीय अङ्क में साकार होता है । यहाँ पर सीता के निरवधि विरह एवं तज्जन्य-शोक से करुणरसमण्डित नाट्यसृष्टि प्रस्तुत की जाती है । तत्पश्चात् दूसरे अंक में घटी शम्बूकवध की घटना के परिणाम स्वरूप “ मृतपुत्रों के सजीवन होने ” का घटनाचक्र 4-5-6 अंकों में आकारित किया गया है । अर्थात् शूद्रतापस शम्बूक का वध करने से यदि मृत ब्राह्मणपुत्र सजीवन हो सकता है तो यही मिथकीय सत्य राम के व्यक्तिगत जीवन में भी कैसे शनैः शनैः मूर्तिमन्त होता है; यह 4-5-6 अङ्क में दिखलाया जाता है । शम्बूकवध के बाद उसी दिन राम अपनी वापसी यात्रा में ही माता सहित के दो पुत्रों को लेकर ही अयोध्या वापस लौटते हैं – यह नाट्यगत सत्य है । सीतात्याग के साथ ही जो गर्भस्थ संतानो का प्रसव भी संशयग्रस्त हो गया था, वह दोनों (कुश एवं लव) नाटक के उत्तरार्द्ध में (अङ्क 4 से 7) फिर से अपने मातापिता को मिलते हैं । इस तरह भवभूतिने ‘उत्तररामचरित’ नामक नाटक की जो रचना की है, वह करुणरसप्रधान होते हुए भी करुणान्त नहीं है । बल्कि स्वाभाविकरूप से ही शम्बूकवध रूपी कर्मका परिपाक दिखलानेवाली और सुखान्त में परिणत होनेवाली एक अनुपम नाट्यसृष्टि हमारे सामने रखी गई है ।।
3.0 वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड में जो शम्बूकवध की पुराकथा (Myth) प्रस्तुत हुई है, उसके अन्तस्तल में जाकर भवभूति ने राम के उत्तरचरित को बारिकी से देखा है । दूसरे शब्दों में कहें तो – भवभूतिने शम्बूकवध के फलितार्थ के रूप में राम के उत्तरजीवन को परिणत होता हुआ निरूपित किया है । अब हम यह देखेंगे कि शम्बूकवध के साथ सम्बद्ध घटनाचक्र को चार भाग में विभक्त करके भवभूतिने उसका एक तरह से रूपकात्मक अर्थघटन करके, उसे किस तरह ‘रूपक’ के रूप में प्रस्तुत किया है ।
3.1 शम्बूक की मिथक में कहा गया है कि शूद्र व्यक्ति को तप में अधिकार नहीं है । किन्तु प्रश्न होता है कि – यहाँ कौन से शूद्र की बात है ? अर्थात् यहाँ शूद्र कौन है ? विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि राम के उत्तर जीवन में प्रजाजन ने ही शूद्र के रूप में एक अनधिकृत दुष्कर्म किया है । जैसा कि अयोध्यावासी प्रजा ने किसीके व्यक्तिगत जीवन में झाँख कर जो निंदाकर्म शूरु किया [सीताविषयक अपवाद प्रचारित किया], वही शूद्रत्व था । परगृहवास करनेवाली स्त्री को, राजा को अपने घर में नहीं रखना चाहिए, सीता के उदर में किस के पुत्र पल रहे होंगे ? – इत्यादि दुर्वचन बोलकर प्रजा ने राजकर्तव्य में जो अनधिकृत हिस्सा लिया –वह था “शूद्र का तप में अनधिकार”। ऐसे शूद्रत्व का तो वध ही करना चाहिए । अन्यथा किसी द्विज का शिशु अवश्य ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होगा । जो इस नाटक में भी हुआ है । जैसा कि – राम ने अपनी प्रजा को सीताविषयक गलत निंदा प्रसारित करते हुए नहीं रोकी, नहीं टोकी । तो उसके परिणाम स्वरूप, इनकी दोनों संतानों का प्रसव ही आशंकाग्रस्त हो गया । सीतात्याग के कारण राम की पैदा होनेवाली संतान, प्रसव होने से पहले ही, गर्भावस्था में ही मर जाय, ऐसी दारुण दशा का निर्माण होता है ।
3.2 अनधिकृत रूप से तप कर रहे शूद्र का राम ने वध कर दिया – इस मिथकीय घटनाक्रम के द्वितीय सोपान को, कविने नाटक में कैसे साकार होता हुआ दिखलाया है ? वह देखा जाय तो, तीन बातें ध्यानास्पद होती है । जैसी कि – राम ने प्रजानुरञ्जन के लिए सीता का त्याग कर दिया; और द्वादश वर्ष पर्यन्त मूक बनकर, राजकार्य में सदैव सन्नद्ध रहे । राजकर्तव्य का पालन करते समय वे कभी भी सीता के लिए जाहिर में, या एकान्त में, क्षण भरके लिये भी विलाप नहीं करते है ।। किन्तु जब अश्वमेध-याग करने का प्रसङ्ग आता है तब राम ने धर्मकार्यार्थ भी दूसरा विवाह नहीं किया; और सीता की ही हिरण्मयी प्रतिकृति बनवा कर अपनी ‘वामाङ्गी’ के रूप में सीता को ही (जाहिर में)पुनः प्रतिष्ठित करके, राम ने एक तरह से शूद्रत्व को प्राप्त हुई प्रजा के गाल पर थप्पड ही मार दी है । दूसरे विवाह के लिए राम की असम्मति रूप निर्णय से, राम ने जाहिर में यह सूचित कर दिया कि उनकी दृष्टि में तो सीता पवित्र ही है; और राम ने अपने हृदय से तो सीताजी का त्याग किया ही नहीं है । इस तरह से, राम ने जो हिरण्मयी सीता की प्रतिकृति की स्थापना की थी, वह सीताविषयक प्रजा की मान्यता का सीधा वध ही था ।।
राजा के व्यक्तिगत जीवन में झांखने कि चेष्टा एक तरह से प्रजा की शूद्रता ही थी । हमें किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जाहिर में बोलने की, निंदा करने की अनधिकृत चेष्टा नहीं करनी चाहिए । ऐसी शूद्रता सदैव वध्य होती है । राजा राम ने ऐसी शूद्रता का वध सीता की हिरण्मयी प्रतिकृति के द्वारा सूक्ष्म रूप में किया है ।।
3.3 शम्बूकवध प्रसङ्ग में, (तृतीयचरण में) राम के खड्गप्रहार के बाद शूद्र शम्बूक का दिव्य पुरूष के रूप में रूपान्तरण होता है । अब वह “अन्वेष्टव्यो यदसि भुवने भूतनाथः शरण्यः.........।” इत्यादि बोलता हुआ राम को प्रणाम करता हुआ, उनके सामने नतमस्तक खडा रहता है । बस, वही ढंग से, सप्तम अङ्क में गर्भाङ्क पूर्ण होने के बाद, अरुन्धती नगरजनों को पूछती है कि वैश्वानर अग्नि ने जिसके पुण्यशाली चारित्र्य का निर्णय किया है, और देवों ने जिसकी संस्तुति की है; तथा जो देवयजनभूमि से प्रादुर्भूत हुई है, ऐसी इस सीतादेवी का स्वीकार किया जाय या नहीं ? – इस विषय में आप सब की क्या राय है ? तब लक्ष्मण कहता है कि अरुन्धती के द्वारा उलाहना दिये गये यह पौरजानपद और सकल भूतसमूह आर्या सीता के सामने नतमस्तक खडा है; और सीता देवी को प्रणाम कर रहा है । - एक तरह से सीता देवी की क्षमायाचना कर रहे है ।
इस तरह से, अयोध्यावासीओं की सीता-विषयक मान्यता बदल गई; उनमें से शूद्रता चली गई । अयोध्या की प्रजा का यह ऊर्ध्वीकरण था । शूद्रत्व का वध होने पर प्रजामानस का यह दिव्यरूपान्तरण ही था । जिस तरह से अनधिकृत तप को रोकने के लिए राम ने शम्बूक का वध किया और शम्बूक का दिव्य पुरूष के रूप में जो परिवर्तन हुआ था, बस वैसे ही, यहाँ पर – नाटक के अन्त में सीता –विषयक लोकापवाद प्रसारित करने वाले प्रजामानस का लज्जित होकर, अन्त में दिव्यता में परिणमन किया गया है ।।
3.4 शम्बूकवध की मिथक में, राम ने किसी द्विज के मृत शिशु को पुनरुज्जीवित करने के लिए ( जीवातवे ) शम्बूक का वध किया; और उसके परिणाम स्वरूप मृतशिशु पुनर्जीवन प्राप्त करता भी है । तो इस ‘उत्तररामचरित’ नाटक में भी, प्रजामानस में परिवर्तन आने से जो कुश-लव ‘वाल्मीकि के अन्तेवासी’ के रूप में पहले प्रसिद्ध हुए थे, वही बाद में राम-सीता के संतान के रूप में नया-सही-अभिज्ञान प्राप्त करते है । दूसरे शब्दों में कहें तो – कुश-लव “ द्विजत्व” को प्राप्त करते है ।
करुणामय बनकर राम ने यदि किसी द्विज के मृतशिशु को पुनर्जीवित करने के लिए शम्बूक वध रूप कठोर पुण्यकर्म किया हो तो, राम के पुत्र, जो सीता के गर्भ में ही थे – और जन्म प्राप्त करने से पहेले ही अन्धेरे में तिरोहित हो गये थे – वह भी पुनःप्रादुर्भूत होने ही चाहिए । ऐसी कर्मफल के सिद्धान्त की अपेक्षा है ( या कवि-न्याय की अपेक्षा है ) - जो भवभूतिने इस प्रकार पूर्ण की है ।
4.0 नाटक के आरम्भ में कुलगुरु वसिष्ठने जो संदेश भेजा है, उसमें कहा गया है कि-
जामातृयज्ञेन वयं निरुद्धास्त्वं बाल एवासि नवं च राज्यम् ।
युक्तः प्रजानाम् अनुरञ्जने स्यास्तस्माद्यशो यत्परमं धनं वः ।। (1.11)
“ राम नये राजा है और प्रजाराधन रूप कर्तव्यपालन से जो यश अर्जित किया जाय वही उसके लिये परम धन होगा । ” वसिष्ठ की ऐसी आज्ञा से प्रेरित होकर राम ने प्रजाराधन का एक (सीतात्याग रूप एक) ही कार्य नहीं किया था, परन्तु दो कार्य किये है । राम के उत्तर जीवन में सीतात्याग के साथ साथ शम्बूक-वध प्रसङ्ग भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है- ऐसा भवभूति का उपक्रम है । यदि यह दूसरी घटना का सही मायने में मूल्याङ्कन न किया जाय तो वह नाट्यविवेचन के लिए शोभास्पद बात नहीं होगी । क्योंकि नाटक जैसी समय की पाबन्दी स्वीकार ने वाली कला का जब कोई कवि अपने कथयितव्य को मूर्तिमन्त करने के लिए अवलम्बन लेता है तब, वह कुछ भी अनावश्यक चीज अपने नाटक में नहीं रख सकता है; और यह बात एक सिद्धान्त के रूप में सभी विवेचकों ने मानी है । तथापि दुर्भाग्य से शम्बूकवध प्रसङ्ग को अद्यावधि गंभीरता से नहीं देखा गया है । एवमेव, इसी प्रसङ्ग के सन्दर्भ में उत्तर रामचरित के संविधान की कतिपय क्षतियाँ भी उद्भावित की गई है । जैसा कि – डो. एस. के. बेलवालकरजी और डो. जी. के. भट ने कहा है कि - 1. शम्बूकवध प्रसंग के लिये एक पूरे स्वतन्त्र अंक की आवश्यकता नहीं थी, इस को विष्कम्भक में सूचित किया जा सकता था । 2. दो कुमारों के अभिज्ञान के लिये चार,पाँच और षष्ट अंक की भी आवश्यकता नहीं थी । उत्तररामचरित के 2, 4, 5, एवं 6 अंकों की आवश्यकता को नहीं समझने के कारण, सभी विद्वान् भावकों ने मिलकर भवभूति को बडा अन्याय किया है । क्योंकि राम को अपने उत्तर जीवन में सीतात्याग का जो कठोर निर्णय लेना पडा, वह यदि राजकर्म है; तो उनके द्वारा किया गया शम्बूकवध भी दूसरे एक राजकर्म का ही अंश था । सीता भी जब सुनती है कि – “आज राम शम्बूकवध के लिए पञ्चवटी में आये हैं” तब तुरंत वह बोलती है कि – दिष्ट्या अपरिहीन-राजधर्मः खलु स राजा ।(3-8 के उपर) । इस तरह सीताने ‘शम्बूकवध’ के कर्म को राम के एक राजकर्म के रूप में ही देखा है, और उसके लिए राम को अभिनन्दन भी दिया है ।
इसी तरह से, चतुर्थ अंक के आरम्भ में भी सौधातकि ने वसिष्ठ पर कटाक्ष करते हुये कहा है कि –“ इसने आते ही बछडेवाली कपिला गाय मडमडायिता ” (उदरस्थ) करली है, - इसका मतलब भी यही हो सकता है कि सीता-त्याग के लिये यही कुलगुरु जिम्मेदार है । ( चतुर्थांक का विष्कम्भक हास्यपूर्ण है, तथा रसान्तर के लिये प्रयुक्त है – ऐसा माना जाता है , परन्तु वह भी व्यंजनापूर्ण है । कपिला गाय से सीता की मौत ही व्यंजित की जा रही है । )
इस तरह राम के उत्तर जीवन में एक नहीं, दो घटनाओं को केन्द्र में रखकर नाटक का मूल्यांकन करना चाहिए । जिस तरह से सीतात्याग और तज्जन्य विरह, या शोक- यह नाटक का एक विषय बना है; उसी तरह से शम्बूकवध रूप राजकर्म और तज्जन्य पुण्य के बल पर राम को माता सहित के पुत्रों की प्राप्ति होती है (और नाटक सुखान्त में परिणत होता है) – यह भी इस नाटक का विषय मानना चाहिये । हमारे नाट्यकवि भवभूति उत्तररामचरित के सातों अंकों में जो प्रदर्शित कर रहे है उसका प्रयोजन ढूँढना ही चाहिये है ।
4.1 शम्बूकवध की मिथक का जो मार्मिक बिन्दु है, वह है – “मृतशिशु का पुनर्जीवन ।” अतः अब हमें यह देखना होगा कि क्या यह विषय ‘उत्तररामचरित’ के सातों अङ्कों में साद्यन्त-सुव्याप्त है या नहीं ?
‘उत्तररमाचरित’ नाटक के आरम्भ में सीतात्याग एक महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में उभरकर सामने जरूर आती है, परन्तु अन्ततक जाते वही एक घटना का प्राधान्य नहीं बना रहता है । सीतात्याग के साथ साथ शूरु से ही, बल्कि उससे भी पेहले –चित्रवीथिका प्रसंग में ही प्रथम चित्र के रूप में जृम्भकास्त्रों को जब प्रणाम किया जाता है तब से, कथा के अन्तस्तल में चलने वाला दूसरा एक कथांश भी है; वह है मृतप्रायः शिशुओं का पुनर्जीवन एवं राम-सीता के पुत्रों के रूप में उन दोनों का अभिज्ञान । अन्तस्तल में प्रवाहमान यह दूसरे विषय का प्राधान्य क्रमशः बढता जाता है; जो नाटक के उत्तरार्द्ध में मुखरित होकर – जृम्भकास्त्र के प्रयोग के साथ हि मानों कि अज्ञातवास कि जृम्भा से मुक्त होकर 4-6 अङ्क की रङ्गभूमि उपर आकारित होता जाता है । सूक्ष्मता से देखा जाय तो कुश-लव का पुनर्जीवन एवं सीता-राम के पुत्रों के रूप में अभिज्ञान – यही एक घटनाचक्र ‘उत्तररामचरित’ के सातो अङ्कों मे साद्यन्त एवं सुग्रथित रूप से सुव्याप्त है ।
4.2 प्रथम अङ्क में वसिष्ठ के सन्देशवाहक अष्टावक्र जो आशीर्वाद देते है कि – तत् किम् अन्यद् आशास्महे ? केवलं वीरप्रसवा भूयाः ।। और तत्पश्चात् चित्रवीथिका प्रसङ्ग में, सबसे पहले ही चित्र में जृम्भकास्त्र को देखकर राम कहते हैं कि – सर्वथेदानीं त्वत् प्रसूतिम् उपस्थास्यन्ति । “यह जृम्भकास्त्र अब तेरी संतति की सेवा में उपस्थित रहेंगे ।” इस तरह से सीता-राम की संतति के पास जृम्भकास्त्र का स्वतःसिद्ध होना, एक प्रमाण के रूप में प्रथमाङ्क में ही कहा गया है ।
4.3 यही बात द्वितीय अङ्क के शुद्ध विष्कम्भक में अङ्कुरित हो उठती है । आत्रेयी वनदेवता वासन्ती से कहती है कि – किसी देवता ने आकर वाल्मीकि को कुश-लव नाम के दो शिशु समर्पित किये है; और उन दोनों को जृम्भकास्त्र तो आजन्मसिद्ध है । वे दोनों पढने में इतने तेज है कि मैं उन के साथ बैठकर पढ नहीं पाती हूँ । अतः मैं अगस्त्य-लोपामुद्रा का आश्रम ढूंढती हुई यहाँ तह आयी हूँ ।।
4.4 तृतीयाङ्क के विष्कम्भक में भी सीता को दो पुत्र होने की यही बात दूसरे शब्दों में पुनरावृत्त हुई है । तमसा-मूरला के संवाद से हमें ज्ञात होता है कि लक्ष्मण के चले जाने के बाद, प्राप्तप्रसववेदना सीता गङ्गाप्रवाह में गिरती है । लेकिन वहाँ पर ही उसने दो पुत्रों को जन्म दिया । और गङ्गाजी ने सीता की, एवं दो पुत्रों की भी रक्षा करते हुए बिगडती बाजी सम्हाली है ।
तृतीयाङ्क की प्रमुख दृश्यावली में करिकलभ का एवं मयूरनर्तन का जो प्रसङ्ग है, वह दोनों बडे सूचक है । तृतीयाङ्क में दो तरह के प्रमुख कार्य दिखाई पडते है –(1) बारह वर्षों से राम ने जो सीता को ‘नियतं विलुप्ता’ मानी है; और पञ्चवटी को देख कर वे जो बार बार मूर्च्छित हो रहे हैं उसको सीता के संजीवनी समान करस्पर्श से स-भानावस्था(शुद्धि) में लाया जाता है । और ऐसा करके “सीता कदाचित्/कुत्रचित् जीवित हो सकती है” ऐसी एक आशङ्का राम के चित्त में डाली जाती है । (2) तथा आर्यपुत्र राम की उपस्थिति में, करिकलभ एवं मयूरनर्तन के प्रसङ्ग द्वारा सीता के चित्त में अपने पुत्रों की स्मृति पुनः सञ्चारित करने का द्वितीय नाट्यकार्य भी सम्पन्न किया जाता है ।
4.5 उत्तररामचरित के चतुर्थ अङ्क में, वाल्मीकि के आश्रम में जनक और कौसल्या का मिलन होता है । लेकिन यहाँ पर वे सीता-राम के पुत्र लव को ‘आश्रमबटु’ के रूप में ही देखते है । परन्तु कौसल्या के मन में तो साश्चर्य प्रश्न होता ही है कि रामभद्र की आकृति को मिलनेवाला यह किशोर कौन है? उसी क्षण अरुन्धती भी एक ‘अपवार्य’ उक्ति में बोलती है कि – इदं नाम तद्भागीरथीनिवेदितरहस्यं कर्णामृतम् । न त्वेवं विद्मः कतरोડयम् आयुष्मतोः कुशलवयोरिति ।। - इस तरह चतुर्थ अङ्क में भी सीता के संतानो की बात पल्लवित होने लगती है ।
4.6 पञ्चम अङ्क में सीतापुत्र लव के साथ, अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लेकर, लक्ष्मणपुत्र चन्द्रकेतु का युद्ध होने का संरम्भ शूरु हो जाता है । लव की बाणवृष्टि देखकर सारथि सुमन्त्र को बाल रघुनन्दन की स्मृति हो आती है । “धृतधनुषं रघुनन्दनं स्मरामि ।।” (5.4) इस युद्ध के दौरान लव ने तो जृम्भकास्त्र का प्रयोग भी कर दिया; और सब चकित हो ऊठे । यहाँ पर भी तिरोहित हुए राम-सीता के संतान क्रमशः आविर्भूत होते दिखाई पडते है । मानों शम्बूकवध के द्वारा एक अयोध्यावासी मृत द्विजशिशु को पुनः सजीवन करवाने का जो पुण्य होगा उसके ही फल-स्वरूप राम-सीता के तिरोहित संतान अब पुनःप्रादुर्भूत हो रहे है ।
4.7 षष्ठ अङ्क में लव एवं चन्द्रकेतु के युद्ध को आकाशमार्ग से अयाध्या की और वापस जा रहे श्रीराम देखते हैं । जृम्भकास्त्र के प्रभाव से राम की सेना तो निश्चेष्ट पडी है; परन्तु दो कुमारों का भयानक युद्ध देखकर, राम वाल्मीकि के आश्रम में नीचे उतर आते है । और वहाँ पर ही अपने पुत्रों को - लव एवं कुश को - क्रमशः देखने का सौभाग्य प्राप्त करते है । परन्तु यहाँ पर राम को दोनों कुमारों का कोई निश्चित अभिज्ञान नहीं होता है । क्योंकि “हम तो वाल्मीकि के हैं” “हमें हमारी माता का नाम भी ज्ञात नहीं है” इत्यादि वाक्यों को लव-कुश से सूनकर राम गुमराह हो जाते है । यद्यपि राम को अनेक कारणों से शङ्का तो हो ही रही थी कि यह दोनों मेरी ही संतति होगी । क्योंकि उन्होंने ही पहले सीता का गर्भ द्विधा ग्रन्थीभाव वाला है ऐसा जाना था ।
4.8 सप्तम अङ्क के गर्भाङ्क को देखने के बाद राम यह जान पाते हैं कि उनकी अलग-बगल में बैठे लव एवं कुश ही उनके दो पुत्र हैं । शम्बूकवध रूप एक विडम्बनापूर्ण राजकार्य से राम ने जो पुण्य अर्जित किया था, उसका प्रकटीकरण यहाँ होता है । (राम के उत्तर जीवन की एक विडम्बना यह थी कि जो अयोध्यावासी प्रजा ने राम की सन्तति को सकुशल प्रसूत नहीं होने दी, वही प्रजा के एक मृतशिशु को पुनर्जीवित करने के लिए राम को शम्बूक का वध करने के लिए जाना पडा था । अतः शम्बूकवध के बाद राम की जो वापसी यात्रा शूरु होती है उसमें ही राम को अपने दोनों पुत्र , उनकी माता (सीता) के साथ वापस मिल जाते है – यह ध्यानास्पद बात है । )
5.0 उपसंहार-
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राम ने अपने उत्तर जीवन में वसिष्ठ की आज्ञा के अनुसार मुख्य रूप से दो
राजकार्य (प्रथम दो अङ्कों में) किये है- (1) सीतात्याग एवं (2) शम्बूकवध । कवि भवभूति ने इन दोनों घटनाओं के नाट्यात्मक परिणाम, जैसे कि – (1) सीता का विरह एवं तज्जन्य शोक से करुणमण्डित तृतीय अङ्क; तथा (2) अनधिकृत तपश्चर्या कर रहे शूद्र का वध एवं तज्जन्य पुण्य से अपने ही मृतप्रायः शिशुओं को पुनर्जीवन प्राप्त होना – द्विजत्व प्राप्त होना – इन बातों को बडी कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है । और इस तरह उत्तररामचरित के द्वितीय एवं चतुर्थ, पञ्चम तथा षष्ठ अङ्क की जिस में सार्थकता बनी रहे ऐसी एक अनुपम नाट्यसृष्टि का निर्माण करके दिखलाया है ।।
भवभूति को शम्बूकवध की कथा एक मिथक के रूप में, वाल्मीकीय रामायण से प्राप्त हुई थी । परन्तु उसे सही अर्थ में राम के ही वर्तमान जीवन में साकार होती हुई दिखलाने का सफल कविकर्म केवल भवभूतिने ही किया है । इस तरह से उन्होंने अपना महाकवित्व सिद्ध किया है ।।
‘उत्तररामचरित’ का सुखान्त कोई नाट्यशास्त्रीय आज्ञा का कृत्रिम परिणाम नहीं है । परन्तु एक मिथकीय सत्य ही राम के जीवन में साकार होता है, इसीलिए वह सुखान्त बना है ऐसा दिखलाकर भवभूति ने राम के दुष्कर राजकर्म का सुफल इसी जन्म में परिणत होता हुआ सिद्ध किया है । “उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते” यह उक्ति का मर्म भी उसके सुखान्त होने में ढूँढना चाहिये ।।
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वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन
गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद – 9
bhattvasant@yahoo.co.in
( भवभूति समारोह, फरवरी 2008, ग्वालियर में प्रस्तुत किया गया शोध-लेख )
1.0 प्राचीनतम धार्मिक मान्यताओं को व्यक्त करनेवाली अतिमानवीय कथाओं को ‘पुराकथा या पुराकल्पन’(अर्थात् Myth) ‘मिथक’ कहते है । कर्मफल के सिद्धान्त को विशद करने के लिए भी कदाचित् ‘मिथक’ का निर्माण किया जाता है । ऐसे मिथक प्रथम दृष्टि में तो नितान्त अवैज्ञानिक (या अर्धवैज्ञानिक) जैसे ही प्रतीत होते हैं । परन्तु ऐसे मिथकों के पीछे कोई संस्कृतिविशेष के लोगों की एक तिर्यक् दार्शनिक दृष्टि भी कार्यरत होती है । क्रान्तद्रष्टा कवि जब कोई काव्य का प्रणयन करते है तब वे प्रायः ऐतिहासिक ख्यात-इतिवृत्त का ही आश्रयण करते है, या तो कदाचित् अपूर्व-कल्पना मण्डित कथावस्तु लेकर सामने आते हैं । परन्तु जब ऐतिहासिक कथावस्तु का आश्रयण करके उसमें मूलतः उपनिबद्ध कोई मिथकीय तत्त्व का, अपनी निजी कविदृष्टि से, कोई अपूर्व अर्थघटन करके दिखलाते हैं तब वे मर्त्य कवि-व्यक्तित्व से उपर उठकर अमर महाकवि बन जाते है । ख्यात-इतिवृत्त का आश्रयण करनेवाले कवि से हम जो “कवि-न्याय” की उम्मीद रखते है उसमें भी मिथकीय अर्थघटन का समावेश किया जा सकता है ।
2.0 भवभूति की कविदृष्टि में राम के उत्तरजीवन में एक नहीं, दो घटनायें प्रमुख है -1. लोकापवाद से राम के द्वारा सीता का त्याग, एवं 2. अकालमृत्यु को प्राप्त हुए किसी ब्राह्मण के बालकपुत्र को पुनरुज्जीवित करने के लिए रामने किया हुआ शूद्र तापस – ‘शम्बूक’– का वध । इन दोनों घटनाओं को लेकर भवभूतिने ‘उत्तररामचरित’ की रचना की है । यहाँ पर (सीता-त्याग का) प्रथम घटनाचक्र तो पूरा ऐतिहासिक है, परन्तु जो दूसरी ( शूद्रतापस के वध द्वारा मृतपुत्र को पुनरुज्जीवित करने की ) घटना है, वह एक अवैज्ञानिक मिथक ही है । क्योंकि किसी शूद्र के तप करने से कोई ब्राह्मणपुत्र का अकाल मृत्यु हो जाय, या एक शूद्र-तापस का वध करने से वह बालक पुनरुज्जीवित हो जाय – यह दोनों बातें(मान्यतायें) आज के विज्ञानप्रधान युग में ग्राह्य नहीं हो सकती है । परन्तु महाकवि भवभूति ने सीतात्याग की ऐतिहासिक घटना को प्रथम अङ्क में रखी है, और शम्बूकबध की मिथकीय घटना दूसरे अङ्क में रखी है । तत्पश्चाद् अनुगामी (3 एवं 4-6) अङ्कों में इन दोनों घटनाओं के परिणाम क्रमशः दिखलाये हैं । जैसे कि– सीतात्याग की (प्रथमाङ्क की) घटना का परिणाम तृतीय अङ्क में साकार होता है । यहाँ पर सीता के निरवधि विरह एवं तज्जन्य-शोक से करुणरसमण्डित नाट्यसृष्टि प्रस्तुत की जाती है । तत्पश्चात् दूसरे अंक में घटी शम्बूकवध की घटना के परिणाम स्वरूप “ मृतपुत्रों के सजीवन होने ” का घटनाचक्र 4-5-6 अंकों में आकारित किया गया है । अर्थात् शूद्रतापस शम्बूक का वध करने से यदि मृत ब्राह्मणपुत्र सजीवन हो सकता है तो यही मिथकीय सत्य राम के व्यक्तिगत जीवन में भी कैसे शनैः शनैः मूर्तिमन्त होता है; यह 4-5-6 अङ्क में दिखलाया जाता है । शम्बूकवध के बाद उसी दिन राम अपनी वापसी यात्रा में ही माता सहित के दो पुत्रों को लेकर ही अयोध्या वापस लौटते हैं – यह नाट्यगत सत्य है । सीतात्याग के साथ ही जो गर्भस्थ संतानो का प्रसव भी संशयग्रस्त हो गया था, वह दोनों (कुश एवं लव) नाटक के उत्तरार्द्ध में (अङ्क 4 से 7) फिर से अपने मातापिता को मिलते हैं । इस तरह भवभूतिने ‘उत्तररामचरित’ नामक नाटक की जो रचना की है, वह करुणरसप्रधान होते हुए भी करुणान्त नहीं है । बल्कि स्वाभाविकरूप से ही शम्बूकवध रूपी कर्मका परिपाक दिखलानेवाली और सुखान्त में परिणत होनेवाली एक अनुपम नाट्यसृष्टि हमारे सामने रखी गई है ।।
3.0 वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड में जो शम्बूकवध की पुराकथा (Myth) प्रस्तुत हुई है, उसके अन्तस्तल में जाकर भवभूति ने राम के उत्तरचरित को बारिकी से देखा है । दूसरे शब्दों में कहें तो – भवभूतिने शम्बूकवध के फलितार्थ के रूप में राम के उत्तरजीवन को परिणत होता हुआ निरूपित किया है । अब हम यह देखेंगे कि शम्बूकवध के साथ सम्बद्ध घटनाचक्र को चार भाग में विभक्त करके भवभूतिने उसका एक तरह से रूपकात्मक अर्थघटन करके, उसे किस तरह ‘रूपक’ के रूप में प्रस्तुत किया है ।
3.1 शम्बूक की मिथक में कहा गया है कि शूद्र व्यक्ति को तप में अधिकार नहीं है । किन्तु प्रश्न होता है कि – यहाँ कौन से शूद्र की बात है ? अर्थात् यहाँ शूद्र कौन है ? विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि राम के उत्तर जीवन में प्रजाजन ने ही शूद्र के रूप में एक अनधिकृत दुष्कर्म किया है । जैसा कि अयोध्यावासी प्रजा ने किसीके व्यक्तिगत जीवन में झाँख कर जो निंदाकर्म शूरु किया [सीताविषयक अपवाद प्रचारित किया], वही शूद्रत्व था । परगृहवास करनेवाली स्त्री को, राजा को अपने घर में नहीं रखना चाहिए, सीता के उदर में किस के पुत्र पल रहे होंगे ? – इत्यादि दुर्वचन बोलकर प्रजा ने राजकर्तव्य में जो अनधिकृत हिस्सा लिया –वह था “शूद्र का तप में अनधिकार”। ऐसे शूद्रत्व का तो वध ही करना चाहिए । अन्यथा किसी द्विज का शिशु अवश्य ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होगा । जो इस नाटक में भी हुआ है । जैसा कि – राम ने अपनी प्रजा को सीताविषयक गलत निंदा प्रसारित करते हुए नहीं रोकी, नहीं टोकी । तो उसके परिणाम स्वरूप, इनकी दोनों संतानों का प्रसव ही आशंकाग्रस्त हो गया । सीतात्याग के कारण राम की पैदा होनेवाली संतान, प्रसव होने से पहले ही, गर्भावस्था में ही मर जाय, ऐसी दारुण दशा का निर्माण होता है ।
3.2 अनधिकृत रूप से तप कर रहे शूद्र का राम ने वध कर दिया – इस मिथकीय घटनाक्रम के द्वितीय सोपान को, कविने नाटक में कैसे साकार होता हुआ दिखलाया है ? वह देखा जाय तो, तीन बातें ध्यानास्पद होती है । जैसी कि – राम ने प्रजानुरञ्जन के लिए सीता का त्याग कर दिया; और द्वादश वर्ष पर्यन्त मूक बनकर, राजकार्य में सदैव सन्नद्ध रहे । राजकर्तव्य का पालन करते समय वे कभी भी सीता के लिए जाहिर में, या एकान्त में, क्षण भरके लिये भी विलाप नहीं करते है ।। किन्तु जब अश्वमेध-याग करने का प्रसङ्ग आता है तब राम ने धर्मकार्यार्थ भी दूसरा विवाह नहीं किया; और सीता की ही हिरण्मयी प्रतिकृति बनवा कर अपनी ‘वामाङ्गी’ के रूप में सीता को ही (जाहिर में)पुनः प्रतिष्ठित करके, राम ने एक तरह से शूद्रत्व को प्राप्त हुई प्रजा के गाल पर थप्पड ही मार दी है । दूसरे विवाह के लिए राम की असम्मति रूप निर्णय से, राम ने जाहिर में यह सूचित कर दिया कि उनकी दृष्टि में तो सीता पवित्र ही है; और राम ने अपने हृदय से तो सीताजी का त्याग किया ही नहीं है । इस तरह से, राम ने जो हिरण्मयी सीता की प्रतिकृति की स्थापना की थी, वह सीताविषयक प्रजा की मान्यता का सीधा वध ही था ।।
राजा के व्यक्तिगत जीवन में झांखने कि चेष्टा एक तरह से प्रजा की शूद्रता ही थी । हमें किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जाहिर में बोलने की, निंदा करने की अनधिकृत चेष्टा नहीं करनी चाहिए । ऐसी शूद्रता सदैव वध्य होती है । राजा राम ने ऐसी शूद्रता का वध सीता की हिरण्मयी प्रतिकृति के द्वारा सूक्ष्म रूप में किया है ।।
3.3 शम्बूकवध प्रसङ्ग में, (तृतीयचरण में) राम के खड्गप्रहार के बाद शूद्र शम्बूक का दिव्य पुरूष के रूप में रूपान्तरण होता है । अब वह “अन्वेष्टव्यो यदसि भुवने भूतनाथः शरण्यः.........।” इत्यादि बोलता हुआ राम को प्रणाम करता हुआ, उनके सामने नतमस्तक खडा रहता है । बस, वही ढंग से, सप्तम अङ्क में गर्भाङ्क पूर्ण होने के बाद, अरुन्धती नगरजनों को पूछती है कि वैश्वानर अग्नि ने जिसके पुण्यशाली चारित्र्य का निर्णय किया है, और देवों ने जिसकी संस्तुति की है; तथा जो देवयजनभूमि से प्रादुर्भूत हुई है, ऐसी इस सीतादेवी का स्वीकार किया जाय या नहीं ? – इस विषय में आप सब की क्या राय है ? तब लक्ष्मण कहता है कि अरुन्धती के द्वारा उलाहना दिये गये यह पौरजानपद और सकल भूतसमूह आर्या सीता के सामने नतमस्तक खडा है; और सीता देवी को प्रणाम कर रहा है । - एक तरह से सीता देवी की क्षमायाचना कर रहे है ।
इस तरह से, अयोध्यावासीओं की सीता-विषयक मान्यता बदल गई; उनमें से शूद्रता चली गई । अयोध्या की प्रजा का यह ऊर्ध्वीकरण था । शूद्रत्व का वध होने पर प्रजामानस का यह दिव्यरूपान्तरण ही था । जिस तरह से अनधिकृत तप को रोकने के लिए राम ने शम्बूक का वध किया और शम्बूक का दिव्य पुरूष के रूप में जो परिवर्तन हुआ था, बस वैसे ही, यहाँ पर – नाटक के अन्त में सीता –विषयक लोकापवाद प्रसारित करने वाले प्रजामानस का लज्जित होकर, अन्त में दिव्यता में परिणमन किया गया है ।।
3.4 शम्बूकवध की मिथक में, राम ने किसी द्विज के मृत शिशु को पुनरुज्जीवित करने के लिए ( जीवातवे ) शम्बूक का वध किया; और उसके परिणाम स्वरूप मृतशिशु पुनर्जीवन प्राप्त करता भी है । तो इस ‘उत्तररामचरित’ नाटक में भी, प्रजामानस में परिवर्तन आने से जो कुश-लव ‘वाल्मीकि के अन्तेवासी’ के रूप में पहले प्रसिद्ध हुए थे, वही बाद में राम-सीता के संतान के रूप में नया-सही-अभिज्ञान प्राप्त करते है । दूसरे शब्दों में कहें तो – कुश-लव “ द्विजत्व” को प्राप्त करते है ।
करुणामय बनकर राम ने यदि किसी द्विज के मृतशिशु को पुनर्जीवित करने के लिए शम्बूक वध रूप कठोर पुण्यकर्म किया हो तो, राम के पुत्र, जो सीता के गर्भ में ही थे – और जन्म प्राप्त करने से पहेले ही अन्धेरे में तिरोहित हो गये थे – वह भी पुनःप्रादुर्भूत होने ही चाहिए । ऐसी कर्मफल के सिद्धान्त की अपेक्षा है ( या कवि-न्याय की अपेक्षा है ) - जो भवभूतिने इस प्रकार पूर्ण की है ।
4.0 नाटक के आरम्भ में कुलगुरु वसिष्ठने जो संदेश भेजा है, उसमें कहा गया है कि-
जामातृयज्ञेन वयं निरुद्धास्त्वं बाल एवासि नवं च राज्यम् ।
युक्तः प्रजानाम् अनुरञ्जने स्यास्तस्माद्यशो यत्परमं धनं वः ।। (1.11)
“ राम नये राजा है और प्रजाराधन रूप कर्तव्यपालन से जो यश अर्जित किया जाय वही उसके लिये परम धन होगा । ” वसिष्ठ की ऐसी आज्ञा से प्रेरित होकर राम ने प्रजाराधन का एक (सीतात्याग रूप एक) ही कार्य नहीं किया था, परन्तु दो कार्य किये है । राम के उत्तर जीवन में सीतात्याग के साथ साथ शम्बूक-वध प्रसङ्ग भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है- ऐसा भवभूति का उपक्रम है । यदि यह दूसरी घटना का सही मायने में मूल्याङ्कन न किया जाय तो वह नाट्यविवेचन के लिए शोभास्पद बात नहीं होगी । क्योंकि नाटक जैसी समय की पाबन्दी स्वीकार ने वाली कला का जब कोई कवि अपने कथयितव्य को मूर्तिमन्त करने के लिए अवलम्बन लेता है तब, वह कुछ भी अनावश्यक चीज अपने नाटक में नहीं रख सकता है; और यह बात एक सिद्धान्त के रूप में सभी विवेचकों ने मानी है । तथापि दुर्भाग्य से शम्बूकवध प्रसङ्ग को अद्यावधि गंभीरता से नहीं देखा गया है । एवमेव, इसी प्रसङ्ग के सन्दर्भ में उत्तर रामचरित के संविधान की कतिपय क्षतियाँ भी उद्भावित की गई है । जैसा कि – डो. एस. के. बेलवालकरजी और डो. जी. के. भट ने कहा है कि - 1. शम्बूकवध प्रसंग के लिये एक पूरे स्वतन्त्र अंक की आवश्यकता नहीं थी, इस को विष्कम्भक में सूचित किया जा सकता था । 2. दो कुमारों के अभिज्ञान के लिये चार,पाँच और षष्ट अंक की भी आवश्यकता नहीं थी । उत्तररामचरित के 2, 4, 5, एवं 6 अंकों की आवश्यकता को नहीं समझने के कारण, सभी विद्वान् भावकों ने मिलकर भवभूति को बडा अन्याय किया है । क्योंकि राम को अपने उत्तर जीवन में सीतात्याग का जो कठोर निर्णय लेना पडा, वह यदि राजकर्म है; तो उनके द्वारा किया गया शम्बूकवध भी दूसरे एक राजकर्म का ही अंश था । सीता भी जब सुनती है कि – “आज राम शम्बूकवध के लिए पञ्चवटी में आये हैं” तब तुरंत वह बोलती है कि – दिष्ट्या अपरिहीन-राजधर्मः खलु स राजा ।(3-8 के उपर) । इस तरह सीताने ‘शम्बूकवध’ के कर्म को राम के एक राजकर्म के रूप में ही देखा है, और उसके लिए राम को अभिनन्दन भी दिया है ।
इसी तरह से, चतुर्थ अंक के आरम्भ में भी सौधातकि ने वसिष्ठ पर कटाक्ष करते हुये कहा है कि –“ इसने आते ही बछडेवाली कपिला गाय मडमडायिता ” (उदरस्थ) करली है, - इसका मतलब भी यही हो सकता है कि सीता-त्याग के लिये यही कुलगुरु जिम्मेदार है । ( चतुर्थांक का विष्कम्भक हास्यपूर्ण है, तथा रसान्तर के लिये प्रयुक्त है – ऐसा माना जाता है , परन्तु वह भी व्यंजनापूर्ण है । कपिला गाय से सीता की मौत ही व्यंजित की जा रही है । )
इस तरह राम के उत्तर जीवन में एक नहीं, दो घटनाओं को केन्द्र में रखकर नाटक का मूल्यांकन करना चाहिए । जिस तरह से सीतात्याग और तज्जन्य विरह, या शोक- यह नाटक का एक विषय बना है; उसी तरह से शम्बूकवध रूप राजकर्म और तज्जन्य पुण्य के बल पर राम को माता सहित के पुत्रों की प्राप्ति होती है (और नाटक सुखान्त में परिणत होता है) – यह भी इस नाटक का विषय मानना चाहिये । हमारे नाट्यकवि भवभूति उत्तररामचरित के सातों अंकों में जो प्रदर्शित कर रहे है उसका प्रयोजन ढूँढना ही चाहिये है ।
4.1 शम्बूकवध की मिथक का जो मार्मिक बिन्दु है, वह है – “मृतशिशु का पुनर्जीवन ।” अतः अब हमें यह देखना होगा कि क्या यह विषय ‘उत्तररामचरित’ के सातों अङ्कों में साद्यन्त-सुव्याप्त है या नहीं ?
‘उत्तररमाचरित’ नाटक के आरम्भ में सीतात्याग एक महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में उभरकर सामने जरूर आती है, परन्तु अन्ततक जाते वही एक घटना का प्राधान्य नहीं बना रहता है । सीतात्याग के साथ साथ शूरु से ही, बल्कि उससे भी पेहले –चित्रवीथिका प्रसंग में ही प्रथम चित्र के रूप में जृम्भकास्त्रों को जब प्रणाम किया जाता है तब से, कथा के अन्तस्तल में चलने वाला दूसरा एक कथांश भी है; वह है मृतप्रायः शिशुओं का पुनर्जीवन एवं राम-सीता के पुत्रों के रूप में उन दोनों का अभिज्ञान । अन्तस्तल में प्रवाहमान यह दूसरे विषय का प्राधान्य क्रमशः बढता जाता है; जो नाटक के उत्तरार्द्ध में मुखरित होकर – जृम्भकास्त्र के प्रयोग के साथ हि मानों कि अज्ञातवास कि जृम्भा से मुक्त होकर 4-6 अङ्क की रङ्गभूमि उपर आकारित होता जाता है । सूक्ष्मता से देखा जाय तो कुश-लव का पुनर्जीवन एवं सीता-राम के पुत्रों के रूप में अभिज्ञान – यही एक घटनाचक्र ‘उत्तररामचरित’ के सातो अङ्कों मे साद्यन्त एवं सुग्रथित रूप से सुव्याप्त है ।
4.2 प्रथम अङ्क में वसिष्ठ के सन्देशवाहक अष्टावक्र जो आशीर्वाद देते है कि – तत् किम् अन्यद् आशास्महे ? केवलं वीरप्रसवा भूयाः ।। और तत्पश्चात् चित्रवीथिका प्रसङ्ग में, सबसे पहले ही चित्र में जृम्भकास्त्र को देखकर राम कहते हैं कि – सर्वथेदानीं त्वत् प्रसूतिम् उपस्थास्यन्ति । “यह जृम्भकास्त्र अब तेरी संतति की सेवा में उपस्थित रहेंगे ।” इस तरह से सीता-राम की संतति के पास जृम्भकास्त्र का स्वतःसिद्ध होना, एक प्रमाण के रूप में प्रथमाङ्क में ही कहा गया है ।
4.3 यही बात द्वितीय अङ्क के शुद्ध विष्कम्भक में अङ्कुरित हो उठती है । आत्रेयी वनदेवता वासन्ती से कहती है कि – किसी देवता ने आकर वाल्मीकि को कुश-लव नाम के दो शिशु समर्पित किये है; और उन दोनों को जृम्भकास्त्र तो आजन्मसिद्ध है । वे दोनों पढने में इतने तेज है कि मैं उन के साथ बैठकर पढ नहीं पाती हूँ । अतः मैं अगस्त्य-लोपामुद्रा का आश्रम ढूंढती हुई यहाँ तह आयी हूँ ।।
4.4 तृतीयाङ्क के विष्कम्भक में भी सीता को दो पुत्र होने की यही बात दूसरे शब्दों में पुनरावृत्त हुई है । तमसा-मूरला के संवाद से हमें ज्ञात होता है कि लक्ष्मण के चले जाने के बाद, प्राप्तप्रसववेदना सीता गङ्गाप्रवाह में गिरती है । लेकिन वहाँ पर ही उसने दो पुत्रों को जन्म दिया । और गङ्गाजी ने सीता की, एवं दो पुत्रों की भी रक्षा करते हुए बिगडती बाजी सम्हाली है ।
तृतीयाङ्क की प्रमुख दृश्यावली में करिकलभ का एवं मयूरनर्तन का जो प्रसङ्ग है, वह दोनों बडे सूचक है । तृतीयाङ्क में दो तरह के प्रमुख कार्य दिखाई पडते है –(1) बारह वर्षों से राम ने जो सीता को ‘नियतं विलुप्ता’ मानी है; और पञ्चवटी को देख कर वे जो बार बार मूर्च्छित हो रहे हैं उसको सीता के संजीवनी समान करस्पर्श से स-भानावस्था(शुद्धि) में लाया जाता है । और ऐसा करके “सीता कदाचित्/कुत्रचित् जीवित हो सकती है” ऐसी एक आशङ्का राम के चित्त में डाली जाती है । (2) तथा आर्यपुत्र राम की उपस्थिति में, करिकलभ एवं मयूरनर्तन के प्रसङ्ग द्वारा सीता के चित्त में अपने पुत्रों की स्मृति पुनः सञ्चारित करने का द्वितीय नाट्यकार्य भी सम्पन्न किया जाता है ।
4.5 उत्तररामचरित के चतुर्थ अङ्क में, वाल्मीकि के आश्रम में जनक और कौसल्या का मिलन होता है । लेकिन यहाँ पर वे सीता-राम के पुत्र लव को ‘आश्रमबटु’ के रूप में ही देखते है । परन्तु कौसल्या के मन में तो साश्चर्य प्रश्न होता ही है कि रामभद्र की आकृति को मिलनेवाला यह किशोर कौन है? उसी क्षण अरुन्धती भी एक ‘अपवार्य’ उक्ति में बोलती है कि – इदं नाम तद्भागीरथीनिवेदितरहस्यं कर्णामृतम् । न त्वेवं विद्मः कतरोડयम् आयुष्मतोः कुशलवयोरिति ।। - इस तरह चतुर्थ अङ्क में भी सीता के संतानो की बात पल्लवित होने लगती है ।
4.6 पञ्चम अङ्क में सीतापुत्र लव के साथ, अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लेकर, लक्ष्मणपुत्र चन्द्रकेतु का युद्ध होने का संरम्भ शूरु हो जाता है । लव की बाणवृष्टि देखकर सारथि सुमन्त्र को बाल रघुनन्दन की स्मृति हो आती है । “धृतधनुषं रघुनन्दनं स्मरामि ।।” (5.4) इस युद्ध के दौरान लव ने तो जृम्भकास्त्र का प्रयोग भी कर दिया; और सब चकित हो ऊठे । यहाँ पर भी तिरोहित हुए राम-सीता के संतान क्रमशः आविर्भूत होते दिखाई पडते है । मानों शम्बूकवध के द्वारा एक अयोध्यावासी मृत द्विजशिशु को पुनः सजीवन करवाने का जो पुण्य होगा उसके ही फल-स्वरूप राम-सीता के तिरोहित संतान अब पुनःप्रादुर्भूत हो रहे है ।
4.7 षष्ठ अङ्क में लव एवं चन्द्रकेतु के युद्ध को आकाशमार्ग से अयाध्या की और वापस जा रहे श्रीराम देखते हैं । जृम्भकास्त्र के प्रभाव से राम की सेना तो निश्चेष्ट पडी है; परन्तु दो कुमारों का भयानक युद्ध देखकर, राम वाल्मीकि के आश्रम में नीचे उतर आते है । और वहाँ पर ही अपने पुत्रों को - लव एवं कुश को - क्रमशः देखने का सौभाग्य प्राप्त करते है । परन्तु यहाँ पर राम को दोनों कुमारों का कोई निश्चित अभिज्ञान नहीं होता है । क्योंकि “हम तो वाल्मीकि के हैं” “हमें हमारी माता का नाम भी ज्ञात नहीं है” इत्यादि वाक्यों को लव-कुश से सूनकर राम गुमराह हो जाते है । यद्यपि राम को अनेक कारणों से शङ्का तो हो ही रही थी कि यह दोनों मेरी ही संतति होगी । क्योंकि उन्होंने ही पहले सीता का गर्भ द्विधा ग्रन्थीभाव वाला है ऐसा जाना था ।
4.8 सप्तम अङ्क के गर्भाङ्क को देखने के बाद राम यह जान पाते हैं कि उनकी अलग-बगल में बैठे लव एवं कुश ही उनके दो पुत्र हैं । शम्बूकवध रूप एक विडम्बनापूर्ण राजकार्य से राम ने जो पुण्य अर्जित किया था, उसका प्रकटीकरण यहाँ होता है । (राम के उत्तर जीवन की एक विडम्बना यह थी कि जो अयोध्यावासी प्रजा ने राम की सन्तति को सकुशल प्रसूत नहीं होने दी, वही प्रजा के एक मृतशिशु को पुनर्जीवित करने के लिए राम को शम्बूक का वध करने के लिए जाना पडा था । अतः शम्बूकवध के बाद राम की जो वापसी यात्रा शूरु होती है उसमें ही राम को अपने दोनों पुत्र , उनकी माता (सीता) के साथ वापस मिल जाते है – यह ध्यानास्पद बात है । )
5.0 उपसंहार-
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राम ने अपने उत्तर जीवन में वसिष्ठ की आज्ञा के अनुसार मुख्य रूप से दो
राजकार्य (प्रथम दो अङ्कों में) किये है- (1) सीतात्याग एवं (2) शम्बूकवध । कवि भवभूति ने इन दोनों घटनाओं के नाट्यात्मक परिणाम, जैसे कि – (1) सीता का विरह एवं तज्जन्य शोक से करुणमण्डित तृतीय अङ्क; तथा (2) अनधिकृत तपश्चर्या कर रहे शूद्र का वध एवं तज्जन्य पुण्य से अपने ही मृतप्रायः शिशुओं को पुनर्जीवन प्राप्त होना – द्विजत्व प्राप्त होना – इन बातों को बडी कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है । और इस तरह उत्तररामचरित के द्वितीय एवं चतुर्थ, पञ्चम तथा षष्ठ अङ्क की जिस में सार्थकता बनी रहे ऐसी एक अनुपम नाट्यसृष्टि का निर्माण करके दिखलाया है ।।
भवभूति को शम्बूकवध की कथा एक मिथक के रूप में, वाल्मीकीय रामायण से प्राप्त हुई थी । परन्तु उसे सही अर्थ में राम के ही वर्तमान जीवन में साकार होती हुई दिखलाने का सफल कविकर्म केवल भवभूतिने ही किया है । इस तरह से उन्होंने अपना महाकवित्व सिद्ध किया है ।।
‘उत्तररामचरित’ का सुखान्त कोई नाट्यशास्त्रीय आज्ञा का कृत्रिम परिणाम नहीं है । परन्तु एक मिथकीय सत्य ही राम के जीवन में साकार होता है, इसीलिए वह सुखान्त बना है ऐसा दिखलाकर भवभूति ने राम के दुष्कर राजकर्म का सुफल इसी जन्म में परिणत होता हुआ सिद्ध किया है । “उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते” यह उक्ति का मर्म भी उसके सुखान्त होने में ढूँढना चाहिये ।।
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